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पिछली रात हल्का-फुल्का सा चाँद
आँखों में लेके सोये थे....
मेरे हिस्से के तारे बाहोँ में थे.......
किसी पहर चुपके से आम की कटी जड़ें .
मेरे शबस्तान में थी,,,,,
वहीं थी कटी ,बाहें पसारे डालियाँ उसकी...
जहाँ उस दोपहर मैंने लेट्टे लेट्टे राजी मौसी की
गालियों के साथ तुम्हारे ठहाके
भी कान तले दबाये थे .......
हम्म पहले सोचा शायेद तुम मेरी बिखरी नरमी को
छुने चले आए थे......
लेकिन तुम तो मेरी फ्रोक्क का फट्टा टुकडा,कंचे,साइकिल की घंटी ,
मेरी चिडिया के टूटे पंख और मॉफी भरे मेरे ख़त,,
समेत रहे थे.......
बोलो तो कितने साल हुवे ?मेरी गिनती तो अब भी
झूले पे तुम्हारी उखड़ी साँसे जो गले में पहनी थी....
उससे अगेह की गिनती माने -तुम्हारी नयी मूंछ छुने
उठी मेरी उँगलियाँ !!!!!!!
अब के जो ख्वाब से निकल के मिलेंगे तो -"गले न मिलना ,
अब बड़ी हो रही हूँ"-बेसक न कह पाउंगी !!!??
निकली तो हूँ छाता लेके ....मालूम भी है भीगना है दोनों को ...
आज तुम्हारे आने से पहले ही रेगिस्तान में बारिश चली है....

uuuuufffff ufffffffff ufffffffffffff
ReplyDeletegazab, kya kamal ki poetry hai....
ek gahra ehsas utar jata hai padhte padhte, jaise koi aankhon se kahta ho wo shabd nahin wo sidhe ehsas hai... kuchh naye purane chitron ke sath, kuchh sidhe sade, kuchh rahsya ke sath...
bohut hi sundar rachna...:)